चिट्ठाजगत रफ़्तार

Wednesday, August 11, 2010

हम क्या करते समझौता,जो अमृतसर-लाहौर ना कर सके.......

मैने तो एक दुआ माँगी थी,उनसे,

पर बो,एक भी इबादत पर गौर ना कर सके................

मैने तो किनारे पर कश्ती माँगी थी,

पर बो,तूफानों का रुख कहीं और ना कर सके.................

मैने तो एक महफिल माँगी थी,उनसे

पर बो,शबाब,शराब का दौर ना कर सके.....................

सोचा था समझौता कर लेंगे,जिंदगी से..

पर उसका क्या,जो अमृतसर-लाहौर ना कर सके................

बो क्या समझने की कोशिश करते मेरे जज्बात को,

जो अपने ही सिक्के की तौल ना कर सके..................

जख्म इतने मिले कि शायद मौत भी कम थी,

पर बो इरादों को कमजोर ना कर सके..............

Wednesday, August 4, 2010

शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी,यदि नैतिक आधार नहीं है........

यह कविता उन्मुक्त जी की लेखनी से लिखित है.......

उनकी यह वाणी अपने माध्यम से तमाम पाठकों को समर्पित है..............


शील,विनय,आदर्श,श्रेष्ठता,तार बिना झंकार नहीं है............

शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी,यदि नैतिक आधार नहीं है........



आविष्कारों की कृतियों में,यदि मानव का प्यार नहीं है............

सृजनहीन विज्ञान ब्यर्थ है,प्राणी का उपकार नहीं है.............




माना,अगम,अगाध,सिन्धु है,संघर्षों का पार नहीं है..........

किन्तु डूबना मँझधारों में नाविक को स्वीकार नहीं है.............

Saturday, July 31, 2010

बेरोजगारी के दौर में साथ छोड़ती ये फिज़ाएँ भी.................

हर रात सोचता हूँ,

एक नई सुबह आये,

सुबह तो हर रोज़ आती है,पर

बैरंग चली आती है

फिर सोचा,कि

ये रात बदल जाए,

पर,ख्वाव वदलकर,

सुनसान चली आती है.......

अब तो ये दिन-रात,

भी अपने न रहे,

जैसे,आँखों में,ओझल,

सपने ना रहे,

मंजिल की तलाश है,

शायद,मिल जाये

पर,रास्तों की भी,

फिज़ाएँ बदल जाती हैं..........

फिर सोचा,

इस किस्मत को बदला जाए

पर इसका भी क्या भरोसा,

कभी भी,शादी होकर,

ससुराल चली जाती है............

बैठे हैं वक्त के सहारे,

शायद बदल जाये

और,ये बोझिल जिन्दगी,

सचमुच ओझल हो जाये....

पर,हमने तो वक्त का,

वह रुख भी देखा है

जीते आदमी को,मौत की दुआ,

करते देखा है

लेकिन,कश्ती की तरह किनारे का इंतजार है.........

नाविक हूँ,लहरों से लड़ना स्वीकार है.............

Saturday, July 24, 2010

मुहब्बत भरी नजर दिल पे गहरा असर करती है......................

होकर जमीं का, आसमान की चाह क्यों करुँ


मैं तुझे पाने की, तमन्ना क्यों करुँ

मुझे खबर है,जुदाई तड़पाएगी तुझे हर पल

इसलिए बता दे, मैं तुझसे वफा क्यों करुँ

ईमान को चोट लगेगी,गर तू ना मिली मुझको

तुझे अपना बनाने की ,दुआ फिर मैं क्यों करुँ

तेरी मासूमियत को बनाया है ,रब ने मुहब्बत के लिए

तुझे न चाहने की खता, मैं क्यों करुँ

तेरी मेरी किस्मत की, राहें हैं जुदा-जुदा,

मैं फिर तेरा बन जाने की ,आरज़ू क्यों करुँ

माना कि मुहब्बत भरी नजर ,दिल पे गहरा असर करती है

तुझे प्यार से देखकर, तुझ पर कोई जादू क्यों करुँ

इतना दुखाया है दिल को तूने मेरे,

इतना रुलाया है मुझे

सब कुछ सहूँ,फिर भी,

तुझसे बे-इंतहा प्यार क्यों करुँ

Wednesday, July 21, 2010

प्यार में छुप-छुप कर मिलने का मज़ा कुछ और है....................

जब उनको मेरी याद आया करेगी,


तब वो मेरी गज़ल गुनगुनाया करेगी

उठाकर देखेगी कभी तस्वीर मेरी,

फिर उसे सीने से लगाया करेगी

ज़ब भी नज़र आयेगीं मेरी निशानियाँ,

उनको दामन में छुपाया करेगी

बीते दिनों की बीती कहानी,

छुप-छुप के गैरों को बताया करेगी

रखा है उसने अंधेरे में जो “प्रकाश”,

भूल पर अपनी पछताया करेगी.................

Sunday, July 18, 2010

लोग फिर भी,आद़ाब करते हैं..........

मेरी मासूमियत का वो ऐसा,


ज़बाब देते हैं,

जैसे मेरी जिन्दगी से हर लम्हे का,

हिसाब लेते हैं,

जिनको समझते थे,सच का देवता वही,झूठ का,

दबाव देते हैं,

चेहरे पढ़ने में तो लग गई उम्र तमाम,अब चेहरे को,

किताब कहते हैं,

बालों को रंगने से नहीं ढक जायेगा वुढापा,फिर भी,

खिज़ाब करते हैं,

दिल में दगा,होठों पर वफा, लोग फिर भी,

आद़ाब करते हैं,

Friday, July 16, 2010

तुम क्यों लगाते हो आँखों में काज़ल इतना.......

पल-पल नज़र में


मुझे भर रहा है कोई.........

दिल पर असर गहरा,

कर रहा है कोई.........

बो क्यों लगाते हैं,

काज़ल आँखों में,इतना

जिसके लिए हर पल,

ज़ल रहा है कोई..................................,

हदों की हदें,

पार कर रहा है कोई,

तुम्हें हद से भी ज्यादा,

प्यार कर रहा है कोई

तुम मुस्कुरा रही हो,

इतना,पता नहीं,

तुम्हारी हर अदा पर,

मर रहा है कोई.............................................।