चिट्ठाजगत रफ़्तार

Sunday, July 18, 2010

लोग फिर भी,आद़ाब करते हैं..........

मेरी मासूमियत का वो ऐसा,


ज़बाब देते हैं,

जैसे मेरी जिन्दगी से हर लम्हे का,

हिसाब लेते हैं,

जिनको समझते थे,सच का देवता वही,झूठ का,

दबाव देते हैं,

चेहरे पढ़ने में तो लग गई उम्र तमाम,अब चेहरे को,

किताब कहते हैं,

बालों को रंगने से नहीं ढक जायेगा वुढापा,फिर भी,

खिज़ाब करते हैं,

दिल में दगा,होठों पर वफा, लोग फिर भी,

आद़ाब करते हैं,

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